नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..
किताबों की तरफ देखता हूँ,
अपनी नर्म संवेदनाओं की ओर देखता हूँ,
सबको देखता हूँ,
स्वार्थ कि अंधी दौड़ को देखता हूँ,
देखता हूँ अपने आप को..
सोचता हूँ..
धूप हर सुबह नयी चमकीली क्यों लगती है,
मोर मग्न होकर क्यों नाचता है..
अख़बार हर सुबह नयी खबरों के साथ कैसे आ जाता है...
इसी के साथ
ख़ुशी के पुराने क्षणों को देखता हूँ,
हंसी के पलों को देखता हूँ,
पार्टियों को देखता हूँ,
उनके आकर्षण को देखता हूँ,
परीक्षा में अच्छे अंक पाने पर होने वाली ख़ुशी को देखता हूँ,
पढ़ाई के दिनों में पैसों कि तंगी को देखता हू,
अपने पुराने दुखों को देखता हूँ,
उनसे निकले हुए आसुओं को देखता हूँ,
उनसे होने वाले बर्ताओं और क्रिया- कलापों को देखता हूँ,
बस में जाते हुए ख़ुशी और गम के पलों को देखता हूँ,
किसी के बारे में सोचते हुए बीत जाने वाले अनुभवों को देखता हूँ,
द्वंद और उहापोह को देखता हूँ,
हार और जीत को देखता हूँ,
असफलताओं से मिले पीड़ा और आसुओं को देखता हूँ
रिश्तों को बनते- बिगड़ते हुए देखता हूँ,
महफिलों में गप्प मारने को देखता हूँ,
ख़ुशी में आत्म -विभोर हो जाने वाले रस को देखता हूँ,
... फिर भी नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..
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