नैतिकता
कुछ लोग नैतिकता के नाम पर कितने विरोधाभासों में रहते हैं। वे नैतिकता के उच्च भारतीय आदर्श प्रतिमानों कितने करीब हैं, इसको इस तरह से समझिए। प्राचीन भारतीय संस्कृति में आचार्यों और धर्मगुरुओं की बहुत इज्जत थी। वे आस्था,आचरण और मूल्यों के साक्षात प्रतिमूर्ति होते थे। उनका आचरण, लोगों के लिए 'आदर्श' होता था और वही लोगों के लिए 'मूल्य' होता था.वे लोभ, मोह और ईर्ष्या से उपर थे। वे मोह-माया से दूर रहें, इसलिए उनके आचरण के विशेष नियम बनाए गए थे.वे समाज में सबसे अधिक सम्मानित थे, इसलिए उनका आचरण आदर्श के अनुरुप होता था। वे आजीवन विवाह नहीं करते थे। उनका कोई परिवार नहीं होता था, क्यूंकि यह माना जाता था कि ' गृहस्थ जीवन मोह और माया का प्रवेश द्वार है। इसमें रहते हुए,मूल्यों के आदर्श प्रतिमानों पर चलना दुरूह है। बाद में इसी आदर्श स्थिति को शंकराचार्य ने अपनाया.चारों पीठों के शंकराचार्य अविवाहित होते हैं. उसके बाद, यही परम्परा आस्था के प्रतीक मंदिरों में भी अपनाई गई। धर्म सर्वोपरि है, इसलिए, इसके प्रतीक मंदिरों में भी आस्था का उच्च प्रतिमान होना चाहिए। इसी मूल्य को बनाए रखने के लिए, बाद में भी, धर्मगुरू, मुख्य पुजारी या महंत आजीवन धर्म के आदर्श मूल्यों को जीवन में उतारने का प्रयास करते थे। वे विवाह नहीं करते थे, उनका अपना कोई परिवार नहीं होता था। धर्मगुरू, मुख्य पुजारी या महंत का उत्तराधिकारी वंशानुगत आधार पर तय नहीं किया जाता था। तार्किक रुप से यह सही भी है।
लेकिन, विरोधाभास तब शुरू होता है, जब कोई गृहस्थ रहते हुए भी धर्मगुरू, मुख्य पुजारी और महंत बन जाता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए संन्यासी के उच्च आदर्शों का पालन करना दुरुह है. शास्त्रों में यह विधिवत रूप से वर्णित है। इसीलिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में आजीवन अविवाहित रहकर संगठन का काम करने वाले प्रचारक लोगों की बहुत इज्जत है. जो, धर्मगुरू, मुख्य पुजारी और महंत निजी पारिवारिक स्वार्थों के आकंठ में डूबे हुए हैं, वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता के पुरोधा कैसे हो सकते हैं ? उन्हें भारतीय संस्कृति का झंडोबरदार नहीं बनना चाहिए,उन्हें इसपर बोलने से पहले, उच्च आदर्शों का पालन करना चाहिए.