Tuesday, July 26, 2016

नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..

नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..

किताबों की तरफ देखता हूँ,
अपनी नर्म संवेदनाओं की ओर देखता हूँ,
 सबको देखता हूँ, 
स्वार्थ कि अंधी दौड़ को देखता हूँ, 
देखता हूँ अपने आप को..
 सोचता हूँ.. 
धूप  हर सुबह नयी चमकीली क्यों लगती है, 
मोर मग्न होकर क्यों नाचता है..
अख़बार हर सुबह नयी खबरों के साथ कैसे आ जाता है...
इसी के साथ
ख़ुशी के पुराने क्षणों को देखता हूँ,
 हंसी के पलों को देखता हूँ, 
पार्टियों को देखता हूँ,
 उनके आकर्षण को देखता हूँ,
 परीक्षा में अच्छे अंक पाने पर होने वाली ख़ुशी को देखता हूँ,
पढ़ाई के दिनों में पैसों कि तंगी को देखता हू,
 अपने पुराने दुखों को देखता हूँ, 
उनसे निकले हुए आसुओं को देखता हूँ,
 उनसे होने वाले बर्ताओं और क्रिया- कलापों को देखता हूँ,
बस में जाते हुए ख़ुशी और गम के पलों को देखता हूँ,
किसी के बारे में सोचते हुए बीत जाने वाले अनुभवों  को देखता हूँ,
 द्वंद  और उहापोह को देखता हूँ, 
हार और जीत को देखता हूँ, 
असफलताओं से मिले पीड़ा  और आसुओं को देखता हूँ
 रिश्तों को बनते- बिगड़ते हुए देखता हूँ,
 महफिलों में गप्प मारने को देखता हूँ, 
ख़ुशी में आत्म -विभोर हो जाने वाले रस को देखता हूँ,
... फिर भी नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..  

कहानी का एक हिस्सा ..

कहानी का एक हिस्सा 


अपना काम छोड़कर वह अपने घर चले गए। उन्हें जानकर यह ख़ुशी हुई कि  यह यहा की परम्परा का हिस्सा है. सामने से आते हुए प्रकाश से बचने के लिए उन्होंने उची दीवार की आड़ ले ली। यह बात आई और गयी, किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया. पगडण्डी तो नहीं सकते पर उसे सड़क भी तो नहीं कहा जा सकता है. वह उन्हीं  रास्तों  से भटकते हुए उस तालाब के पास पंहुचा। ठंडे  पानी के साथ आकाश को निहारते हुए उसे वह पुराना दौर याद आया।  तालाब उसके लिए इंसाइक्लोपीडिया से  कम  नहीं होता  था। बचपन की कितनी यादे  पुराने तहखाने से निकल कर सतह पर आने लगी थी. वह उन यादों  में कुछ पल के लिए खो गया।  जाने -अनजाने वह उस अतीत का हमसफ़र बन गया। यहाँ से उसकी नई  कहानी शुरू होती है. यहीं  तालाब के किनारे नरम नरम हरी दूब पर लेटे  हुए उसने अपने भविष्य की योजना बनाई। आकाश में चील  को उड़ते देखते हुए उसके सपनो के भी पंख लग गए। उसने सोच लिया था कि  उसे क्या  करना है।  

कहानी का एक हिस्सा ..

कहानी का एक हिस्सा 


अपना काम छोड़कर वह अपने घर चले गए। उन्हें जानकर यह ख़ुशी हुई कि  यह यहा की परम्परा का हिस्सा है. सामने से आते हुए प्रकाश से बचने के लिए उन्होंने उची दीवार की आड़ ले ली। यह बात आई और गयी, किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया. पगडण्डी तो नहीं सकते पर उसे सड़क भी तो नहीं कहा जा सकता है. वह उन्हीं  रास्तों  से भटकते हुए उस तालाब के पास पंहुचा। ठंडे  पानी के साथ आकाश को निहारते हुए उसे वह पुराना दौर याद आया।  तालाब उसके लिए इंसाइक्लोपीडिया से  कम  नहीं होता  था। बचपन की कितनी यादे  पुराने तहखाने से निकल कर सतह पर आने लगी थी. वह उन यादों  में कुछ पल के लिए खो गया।  जाने -अनजाने वह उस अतीत का हमसफ़र बन गया। यहाँ से उसकी नई  कहानी शुरू होती है. यहीं  तालाब के किनारे नरम नरम हरी दूब पर लेटे  हुए उसने अपने भविष्य की योजना बनाई। आकाश में चील  को उड़ते देखते हुए उसके सपनो के भी पंख लग गए। उसने सोच लिया था कि  उसे क्या  करना है।  

बिना तर्क के ..

बिना तर्क के 
   सच को जानने का जज्बा जब एक बार पङ जाता है तो सब चीजे बेमानी लगाने लगती है. धुंधले और मटमैले फलक छट जाते हैं. ऐसा होता है एक बार जब आप इससे परेशांन हो जाते है क्योंकि यह रास्ता इतना आसान भी नहीं है. पर जब आप इस रास्ते पर एक बार चल पड़ते है तो गलती करने का कोई चांस नहीं बचता  है. तब खुश होने का रास्ता आपके पास होता है, उस रास्ते से दूर जाने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है.तब  सब ग़लतफ़हमियों से अलग होकर नयी रोशनी के प्रकाश से अलंकृत होना होता है. छोटे छोटे प्रश्न अपने आप से करो , अपने आप सब उत्तर मिल जाएगा. 
       यह बात नहीं है कि कुछ सोचा जाए या समझा  जाए. हकीकत  में  वह सब नहीं होता और वह होना भी नहीं चाहिए। कही से आप शुरू करो बात वही पर आकर रुकती है. किसी को कोई नहीं बता सकता है कि  कैसे सोचा जाए।  वे, बुद्धिमता, आपको ख़ारिज करके अपने रास्ते  चले जाएंगे ,आपको उसकी भनक भी नहीं लगने देगे.  जीवन में सब कुछ तो नार्मल ही होता है. कौन कहा किसी से फरियाद करने जाता है. किसी को किसी के आलेख को पढ़ने की फुरसत कहा है. सब यहाँ  एक से बढ़कर एक है. कहानी कहो या कविता कोई दूसरे के यथार्थ के बारे में थोड़ा भी जहमत उठाना नहीं चाहता. 
              बुनियादी सवाल हो या फिजूल की कोई बात सब जगह ओखम रेजर की जरुरत होती है. वह कैसे, यह सब अपने से तय करना पड़ता है. बौद्धिकता का अपना एक दायरा  होता है।  उसका भी  अपना एक इंटरेस्ट होता है।  गणित के  फारमूले की तरह सब कुछ स्पष्ट नहीं होता है।  समाज  बिना तर्क के चलता है,  वह तो बस चलता ही रहता है।  मत पूछना यह सब कैसे होता है. बस समझ जाना तो, दूसरे को समझाने की कोशिश करना.  वहा न भाव है न श्रद्धा बस ऐसे ही. ठीक तो है. किसी से कुछ न पूछो, न ही किसी से समझने की उम्मीद करो. न तो किसी को समझ में आएगा, न ही कोई जानता है. सब एक्टिंग करते है. 
विश्वास होता है सच को जानने के बाद, लेकिन जब सच जान जाते है तो विश्वास  का नया अवतार जन्म लेता है.. जानने के बाद तास के पत्तो की  तरह क़िरदार ढह जाते है. 
            
        यही से अपने आप पर भरोसा करना  आएगा.  और जब अपने आप पर एक बार भरोसा करना आ गया तो गलतफहमी  की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. यहाँ तर्क भी नहीं है, इतना ही नहीं यहाँ कोई समर्पण भी नहीं है. रोज नए रस्ते और रोज नई  चुनौतियां, सच में कितना मजेदार है न..  रोचक सफर, रोज नए मुकाम, रोज नई  दुनिया.. यह है तर्क का अनोखा, नया पहलू  जो स्वयं अपने आप को वहा पर नहीं लाता, मुकाम पर पहुचाने के बाद उसकी कहानी ख़त्म हो जाती है.