नग्नता का भोंडा विज्ञापन
कभी कभी तो समझ में नहीं आता है कि अमेरिका का दर्शन क्या है. व्यवहारवाद का पूरा दर्शन भी इतनी आसानी से यहाँ के जीवन को अच्छी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता है. एक दिन टीवी पर देखा कि adult intertenment एक्सपो के बारे में एंकर बहुत सी बातें बता रही है. मुझे पहले तो समझ में नहीं आया, पर बाद में पता चला कि यह तन्वी युवतियों के देह कि प्रदर्शनी है. मैंने प्रगति मैदान में बहुत सी प्रदर्शनियां देखी है. कारों, ज्वेलरीऔर अन्य सामानों की भी, पर युवतियों की देह प्रदर्शनी के बारे में नहीं सुना था. फैशन परेड होता है, लेकिन वह अलग है. इस प्रदर्शनी को देखने के लिए यहाँ के बहुत से लोग जाते है. जाहिर है यह नौजवान लड़कियों के अंगों की प्रदर्शनी है. जैसे किसी प्रदर्शनी में अपने सामान के बारे में सब अच्छी से अच्छी बातें बताई जाती हैं, उसी तरह इस एक्सपो में नंगी लड़कियां अपने शरीर के हर उस अंग को अपनी मादक हंसी के साथ लोगों को बताती है. किसका कौन सा अंग अच्छा है, यह बताने या दिखाने की होड़ लगी रहती है. लगता है बाज़ार के हर सामान की तरह इनका हर अंग बिकाऊ है. सब जगह मूल्य की तख्ती टँगी हुई है, जहा जाना है, आप जाइये और बाज़ार के इस खूबसूरत देह को अपने इशारे पे रोबोट की तरह इस्तेमाल कीजिये.
नग्नता यहाँ बेचीं जाती है, 'सेक्स इज ब्यूटीफुल' का टैग हर जगह आपको देखने को मिलेगा. मुझे लगा कि यह कौन सा दर्शन है जहाँ इस तरह कि नग्नता पर किसी को कुछ नहीं होता है. जहाँ देह एक सामान से ज्यादा कुछ नहीं है.
जेम्स और चार्ल्स सांडर्स पियेर्स के अमेरिकी प्रैग्मेटिज्म में मुझे यह सबसे बड़ी खामी दिखाई दी. पैसे कि इस दुनियां में कोई नैतिक मूल्य - बोध नहीं है. पैसा और तुरंत की मस्ती ही मूल्य है. अंगो के इस प्राईस टैग में हम कहा है, इसका किसी को मलाल नहीं है. सेक्स और ड्रग की इस लत ने अमेरिकी समाज में मूल्यों की किसी भी पहचान को नकारना सिखा दिया है. सुन्दरता बिकती है और उसे बेचने के लिए विज्ञापन की जरुरत होती है. यह एक्सपो उसी बेशर्म नग्नता का भोंडा विज्ञापन है, जिसे टीवी प्रमोट कर रहा है. दिल्ली में भी मैंने देखा है की हर चीज़ के विज्ञापन लिए सुंदर और नौजवान लड़कियों को ज्यादा पसंद किया जाता है.टाटा की नैनो कार हो या, बिजली का कोई सामान, हर जगह वैसी ही मानसिकता. धीरे -धीरे ही सही बाज़ार सब जगह सबके ऊपर हावी होता जा रहा है. बाज़ार के इस विज्ञापन का तर्क मुझे समझ में आया कि अगर लड़कियां अपनी मादक मुस्कान से कुछ सामान बेच सकती हैं तो अपने आप को क्यों नहीं.
कहीं भी मुझे नारीवाद के पैरोकारों कि आवाज़ इस मुद्दे पे नहीं सुनायी दी. अमेरिका लिबरल नारीवाद कि प्रसिद्ध जगह है.यहाँ के विश्विद्यालयों में इसके ऊपर मैंने कही भी बहस नहीं देखा. हो सकता है कि यह यहाँ पे कोई सवाल ही नहीं हो.