यू पी में पंचायत चुनाव हो रहे हैं. मैंने अनुभव किया है कि पंचायती चुनाव गाँव के आम लोगों कि रही- सही संवेदनशीलता को भी छीन रहा है. पैसे कि छोटी लालच के लिए गाँव के अपने वाशिंदे गाँव कि तरक्की को भूलकर देश के आम नेताओं कि तरह पंचायत के पैसे को लुटने में लगे हुए हैं. यही वजह है कि गावं के पंचायत का चुनाव अब अपने गाँव के विकास के लिए नहीं बल्कि पैसा बनने के लड़ा जा रहा है. जो भी हो ईमानदारी का कोई भी नामों- निशान नही रह गया है किसी भी चुनाव में. हम किसी और के गाँव कि बात नही करेंगे, बल्कि उस गाँव कि बात करेंगे जहाँ हम रहते हैं. ब्लाक प्रमुख और पंचायत सदस्य खुले आम किसी अमीर या अपराधी प्रवृति के लोंगो कि बाट जोहते हैं. क्योंकि पैसा वही लोग दे सकते है. खुलेआम बोली लगती है. मै इधर बीच एक अलग तरह के लोगों को समाज के बीच फलते- फूलते देख रहा हू. किसी ज़माने में पर्वांचल के माफिया के रूप में कुख्यात एक परिवार से ताल्लुक रखने वाले सभी लोग पंचायत से लेकर जिला परिषद् और मेयर के चुनावों में कूद पड़े है. अख़बारों में उनकी पेशी के समय विज्ञापन ऐसे आता है जैसे वे महात्मा गाँधी जैसे नेक दिल फ़रिश्ते है. कारण सिर्फ एक है, इन लोगों ने अपराध करकर इतना पैसा कमा लिया है कि उस पैसे के नाम पर वे अब समाज सेवा का बिगुल फूक रहे हैं. ये लोग पैसा देकर जरुरी मतों को खरीद सकते है और उसे दूसरे के पक्ष में भी कर सकते है. समाज के इस तबके से कैसे निपटा जाय , इस पर सबको सोचने की जरुरत है. मुझे समझ में नहीं आता क्यों लोग एकाएक भ्रष्ट होते जा रहे है. गाँव के विकास के लिए मिलने वाले पैसे का दुरुपयोग अपने ही आस पास के लोग कैसे करते हैं, इसका जीता- जगाता नमूना ये पंचायत के चुनाव है. मुझे दुःख होता है कि गाँव भी भ्रष्ट हो चुके है. ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े मजबूत कर ली है. यदि गाँव के चुनाव में संवेदना नही रह जाएगी तो देश के स्तर पर हम अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है. प्रश्न अब भी अपनी जगह पर है कि कैसे इन चुनावों को अपराधी और पैसे वाले निकम्में लोगो से दूर रखा जाये.
सतीश कुमार सिंह
वाराणसी