Thursday, August 19, 2010

Why UP is backward state

UP ranks 25th on the Human Development Index, among 28 states.
Among 20 major states of the country, UP stands 18th on Social Development Index.
Proportion of Population living below poverty line(2004-05) : 25.5%.
Literacy rate : 56.3%
But ruling party is getting rich and richer, surprise to know it is third wealthiest party after Congress and BJP.
We may upset by the figures but this is reality.As a person what we can do for our state. Do we have anything common planning as an individual being for betterment. We are blaming all the time for worst situation, but what our responsibility as a resident of state. Blame game must stop and some creative positive idea must come forward. Everywhere there is lacuna. Political system is not working properly. Time has come, vacuum is there, common people have to fill the vacuum.
Satish Kumar Singh.

Sunday, August 15, 2010

१५ अगस्त का मन

आज स्वतंत्रता दिवस है. बहुत दिन हो गए कुछ लिखे हुए.मन में बहुत कुछ लिखने कि इच्छा है. दिन भर मन में हलचल होती रही.व्यग्रता इतनी थी कि शाम को कुछ मित्रों के साथ अपने देश कि स्थिति पर बात की. हल कुछ भी नहीं निकला.देश के लिए जान दे देने वाले अमर शहीदों को आज सुबह याद करते हुए जो भारत कि तस्वीर बनी, बेचैनी उसी से थी. देश का हर तंत्र एक मायने में विफल होता जा रहा है.कहाँ से शुरू करें समझ में नही आता. गाँव से लेकर मीडिया, शिक्षा, पुलिस, नौकरशाही, राजनीति हर जगह भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार दिखाई पड़ रहा है.यह व्यवस्था विफल हो गयी है. किसी भी चीज़ पर अब गर्व नही होता, रोने का मन करता है या कुछ तोड़ -फोड़ करने का मन करता है. व्यवस्था में लगे हुए ज्यादातर लोग बस अपनी जेब भरने में लगे हुए है. कहीं भी चरित्र नाम की कोई चीज़ नही दिखाई पड़ती. हम लोंगों की बात करते हैं, लेकिन आम लोगों के चरित्र में इतनी गिरावट आ गयी है की कहीं से कोई समाधान नहीं दिखाई पड़ रहा है. इस देश का भविष्य क्या होगा आने वाले समय में, सोचकर मन दहल जाता है. आज की तारीख में मुझे स्वयं कोई ऐसा चेहरा नही दिखाई देता जिसके ऊपर मै आँख बंद करके ईमानदारी के रूप में विश्वाश कायम कर सकूँ. यह बात राजनेताओं के सन्दर्भ में कह रहा हूँ. संसद की कार्यवाही देखते समय मन में सच में बहुत पीड़ा होती है. जो लोग सरकार में मंत्री हैं, उनके ऊपर आम लोगों का विश्वाश नहीं है. भारत गावों का देश है , लेकिन कृषि मंत्री किसी गाँव से नही आते है, उन्हें किस लिए मंत्री बनाया गया है, समझ के परे है. देश के प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री है, लेकिन उन्ही के समय में सबसे ज्यादा महंगाई क्यों हो जाती है, इसका जवाब किसी किताब में नही दिखाई देता. गाँव के युवा दिग्भ्रमित हो रहे है, लेकिन किसी के पास उन्हें काम देने के लिए कोई उपाय नही है. ये युवा कल की तारीख में व्यस्था के खिलाफ कुछ असंवैधानिक कार्य करे तो किसका दोष है. यही स्थिति रही तो आने वाले समय में पुलिस और मिलिटरी कानून और व्यवस्था बनाये रखने में अक्षम होगी. गाँव के प्रधान या मुखिया से लेकर देश के मंत्री और प्रदेश के मंत्री सभी जगह लोग किसी भी तरह अपनी झोली भरने में लगे हुए है. यह बहुत ही विडम्बना है कि किसी अपराधी और माफिया का भी सन्देश देश के राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने पर छपता है. पैसे की लालच ने नैतिकता के ताने- बाने को इस कदर भोथरा बना दिया है कि जायज और नाजायज का फर्क मिट सा गया है. अपराधी शान से नेता बन कर लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमते है और पुलिस, थाने में बलात्कार करती है और अपराधियों के साथ मिल कर शराब पीती है. गरीबी दिन पे दिन बढ़ती जाती है और खेलों के नाम पर करोड़ों रुपये का घपला होता रहता है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है. शर्म आती है ऐसे लोकतंत्र पर जहाँ सच कहने वालों को गोलियों उड़ा दिया जाता है. १५ अगस्त ने मुझे झकझोर कर रख दिया है. आजादी दिलाने वाले उन लाखों लोगों के सपनों का भारत ऐसा होगा, जहाँ पर किसी को किसी के ऊपर विश्वाश नहीं होगा, सच में यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है.यह शिक्षा हमारे लिए ठीक नहीं है, इसे बदल देने कि जरुरत है. एक ऐसी शिक्षा की जरुरत है जो तंत्र की विफलता में सहयोगी की भूमिका में नही रह कर उसके अन्दर की सच्चाई को उजागर कर दे.