Friday, September 24, 2010

पंचायती चुनाव और भ्रष्टाचार

यू पी में पंचायत चुनाव हो रहे हैं. मैंने अनुभव किया है कि पंचायती चुनाव गाँव के आम लोगों कि रही- सही संवेदनशीलता को भी छीन रहा है. पैसे कि छोटी लालच के लिए गाँव के अपने वाशिंदे गाँव कि तरक्की को भूलकर देश के आम नेताओं कि तरह पंचायत के पैसे को लुटने में लगे हुए हैं. यही वजह है कि गावं के पंचायत का चुनाव अब अपने गाँव के विकास के लिए नहीं बल्कि पैसा बनने के लड़ा जा रहा है. जो भी हो ईमानदारी का कोई भी नामों- निशान नही रह गया है किसी भी चुनाव में. हम किसी और के गाँव कि बात नही करेंगे, बल्कि उस गाँव कि बात करेंगे जहाँ हम रहते हैं. ब्लाक प्रमुख और पंचायत सदस्य खुले आम किसी अमीर या अपराधी प्रवृति के लोंगो कि बाट जोहते हैं. क्योंकि पैसा वही लोग दे सकते है. खुलेआम बोली लगती है. मै इधर बीच एक अलग तरह के लोगों को समाज के बीच फलते- फूलते देख रहा हू. किसी ज़माने में पर्वांचल के माफिया के रूप में कुख्यात एक परिवार से ताल्लुक रखने वाले सभी लोग पंचायत से लेकर जिला परिषद् और मेयर के चुनावों में कूद पड़े है. अख़बारों में उनकी पेशी के समय विज्ञापन ऐसे आता है जैसे वे महात्मा गाँधी जैसे नेक दिल फ़रिश्ते है. कारण सिर्फ एक है, इन लोगों ने अपराध करकर इतना पैसा कमा लिया है कि उस पैसे के नाम पर वे अब समाज सेवा का बिगुल फूक रहे हैं. ये लोग पैसा देकर जरुरी मतों को खरीद सकते है और उसे दूसरे के पक्ष में भी कर सकते है. समाज के इस तबके से कैसे निपटा जाय , इस पर सबको सोचने की जरुरत है. मुझे समझ में नहीं आता क्यों लोग एकाएक भ्रष्ट होते जा रहे है. गाँव के विकास के लिए मिलने वाले पैसे का दुरुपयोग अपने ही आस पास के लोग कैसे करते हैं, इसका जीता- जगाता नमूना ये पंचायत के चुनाव है. मुझे दुःख होता है कि गाँव भी भ्रष्ट हो चुके है. ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े मजबूत कर ली है. यदि गाँव के चुनाव में संवेदना नही रह जाएगी तो देश के स्तर पर हम अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है. प्रश्न अब भी अपनी जगह पर है कि कैसे इन चुनावों को अपराधी और पैसे वाले निकम्में लोगो से दूर रखा जाये.
सतीश कुमार सिंह
वाराणसी

Thursday, August 19, 2010

Why UP is backward state

UP ranks 25th on the Human Development Index, among 28 states.
Among 20 major states of the country, UP stands 18th on Social Development Index.
Proportion of Population living below poverty line(2004-05) : 25.5%.
Literacy rate : 56.3%
But ruling party is getting rich and richer, surprise to know it is third wealthiest party after Congress and BJP.
We may upset by the figures but this is reality.As a person what we can do for our state. Do we have anything common planning as an individual being for betterment. We are blaming all the time for worst situation, but what our responsibility as a resident of state. Blame game must stop and some creative positive idea must come forward. Everywhere there is lacuna. Political system is not working properly. Time has come, vacuum is there, common people have to fill the vacuum.
Satish Kumar Singh.

Sunday, August 15, 2010

१५ अगस्त का मन

आज स्वतंत्रता दिवस है. बहुत दिन हो गए कुछ लिखे हुए.मन में बहुत कुछ लिखने कि इच्छा है. दिन भर मन में हलचल होती रही.व्यग्रता इतनी थी कि शाम को कुछ मित्रों के साथ अपने देश कि स्थिति पर बात की. हल कुछ भी नहीं निकला.देश के लिए जान दे देने वाले अमर शहीदों को आज सुबह याद करते हुए जो भारत कि तस्वीर बनी, बेचैनी उसी से थी. देश का हर तंत्र एक मायने में विफल होता जा रहा है.कहाँ से शुरू करें समझ में नही आता. गाँव से लेकर मीडिया, शिक्षा, पुलिस, नौकरशाही, राजनीति हर जगह भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार दिखाई पड़ रहा है.यह व्यवस्था विफल हो गयी है. किसी भी चीज़ पर अब गर्व नही होता, रोने का मन करता है या कुछ तोड़ -फोड़ करने का मन करता है. व्यवस्था में लगे हुए ज्यादातर लोग बस अपनी जेब भरने में लगे हुए है. कहीं भी चरित्र नाम की कोई चीज़ नही दिखाई पड़ती. हम लोंगों की बात करते हैं, लेकिन आम लोगों के चरित्र में इतनी गिरावट आ गयी है की कहीं से कोई समाधान नहीं दिखाई पड़ रहा है. इस देश का भविष्य क्या होगा आने वाले समय में, सोचकर मन दहल जाता है. आज की तारीख में मुझे स्वयं कोई ऐसा चेहरा नही दिखाई देता जिसके ऊपर मै आँख बंद करके ईमानदारी के रूप में विश्वाश कायम कर सकूँ. यह बात राजनेताओं के सन्दर्भ में कह रहा हूँ. संसद की कार्यवाही देखते समय मन में सच में बहुत पीड़ा होती है. जो लोग सरकार में मंत्री हैं, उनके ऊपर आम लोगों का विश्वाश नहीं है. भारत गावों का देश है , लेकिन कृषि मंत्री किसी गाँव से नही आते है, उन्हें किस लिए मंत्री बनाया गया है, समझ के परे है. देश के प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री है, लेकिन उन्ही के समय में सबसे ज्यादा महंगाई क्यों हो जाती है, इसका जवाब किसी किताब में नही दिखाई देता. गाँव के युवा दिग्भ्रमित हो रहे है, लेकिन किसी के पास उन्हें काम देने के लिए कोई उपाय नही है. ये युवा कल की तारीख में व्यस्था के खिलाफ कुछ असंवैधानिक कार्य करे तो किसका दोष है. यही स्थिति रही तो आने वाले समय में पुलिस और मिलिटरी कानून और व्यवस्था बनाये रखने में अक्षम होगी. गाँव के प्रधान या मुखिया से लेकर देश के मंत्री और प्रदेश के मंत्री सभी जगह लोग किसी भी तरह अपनी झोली भरने में लगे हुए है. यह बहुत ही विडम्बना है कि किसी अपराधी और माफिया का भी सन्देश देश के राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने पर छपता है. पैसे की लालच ने नैतिकता के ताने- बाने को इस कदर भोथरा बना दिया है कि जायज और नाजायज का फर्क मिट सा गया है. अपराधी शान से नेता बन कर लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमते है और पुलिस, थाने में बलात्कार करती है और अपराधियों के साथ मिल कर शराब पीती है. गरीबी दिन पे दिन बढ़ती जाती है और खेलों के नाम पर करोड़ों रुपये का घपला होता रहता है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है. शर्म आती है ऐसे लोकतंत्र पर जहाँ सच कहने वालों को गोलियों उड़ा दिया जाता है. १५ अगस्त ने मुझे झकझोर कर रख दिया है. आजादी दिलाने वाले उन लाखों लोगों के सपनों का भारत ऐसा होगा, जहाँ पर किसी को किसी के ऊपर विश्वाश नहीं होगा, सच में यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है.यह शिक्षा हमारे लिए ठीक नहीं है, इसे बदल देने कि जरुरत है. एक ऐसी शिक्षा की जरुरत है जो तंत्र की विफलता में सहयोगी की भूमिका में नही रह कर उसके अन्दर की सच्चाई को उजागर कर दे.

Thursday, June 3, 2010

नग्नता का भोंडा विज्ञापन

नग्नता का भोंडा विज्ञापन
कभी कभी तो समझ में नहीं आता है कि अमेरिका का दर्शन क्या है. व्यवहारवाद का पूरा दर्शन भी इतनी आसानी से यहाँ के जीवन को अच्छी तरह से व्यक्त नहीं कर सकता है. एक दिन टीवी पर देखा कि adult intertenment एक्सपो के बारे में एंकर बहुत सी बातें बता रही है. मुझे पहले तो समझ में नहीं आया, पर बाद में पता चला कि यह तन्वी युवतियों के देह कि प्रदर्शनी है. मैंने प्रगति मैदान में बहुत सी प्रदर्शनियां देखी है. कारों, ज्वेलरीऔर अन्य सामानों की भी, पर युवतियों की देह प्रदर्शनी के बारे में नहीं सुना था. फैशन परेड होता है, लेकिन वह अलग है. इस प्रदर्शनी को देखने के लिए यहाँ के बहुत से लोग जाते है. जाहिर है यह नौजवान लड़कियों के अंगों की प्रदर्शनी है. जैसे किसी प्रदर्शनी में अपने सामान के बारे में सब अच्छी से अच्छी बातें बताई जाती हैं, उसी तरह इस एक्सपो में नंगी लड़कियां अपने शरीर के हर उस अंग को अपनी मादक हंसी के साथ लोगों को बताती है. किसका कौन सा अंग अच्छा है, यह बताने या दिखाने की होड़ लगी रहती है. लगता है बाज़ार के हर सामान की तरह इनका हर अंग बिकाऊ है. सब जगह मूल्य की तख्ती टँगी हुई है, जहा जाना है, आप जाइये और बाज़ार के इस खूबसूरत देह को अपने इशारे पे रोबोट की तरह इस्तेमाल कीजिये.
नग्नता यहाँ बेचीं जाती है, 'सेक्स इज ब्यूटीफुल' का टैग हर जगह आपको देखने को मिलेगा. मुझे लगा कि यह कौन सा दर्शन है जहाँ इस तरह कि नग्नता पर किसी को कुछ नहीं होता है. जहाँ देह एक सामान से ज्यादा कुछ नहीं है.
जेम्स और चार्ल्स सांडर्स पियेर्स के अमेरिकी प्रैग्मेटिज्म में मुझे यह सबसे बड़ी खामी दिखाई दी. पैसे कि इस दुनियां में कोई नैतिक मूल्य - बोध नहीं है. पैसा और तुरंत की मस्ती ही मूल्य है. अंगो के इस प्राईस टैग में हम कहा है, इसका किसी को मलाल नहीं है. सेक्स और ड्रग की इस लत ने अमेरिकी समाज में मूल्यों की किसी भी पहचान को नकारना सिखा दिया है. सुन्दरता बिकती है और उसे बेचने के लिए विज्ञापन की जरुरत होती है. यह एक्सपो उसी बेशर्म नग्नता का भोंडा विज्ञापन है, जिसे टीवी प्रमोट कर रहा है. दिल्ली में भी मैंने देखा है की हर चीज़ के विज्ञापन लिए सुंदर और नौजवान लड़कियों को ज्यादा पसंद किया जाता है.टाटा की नैनो कार हो या, बिजली का कोई सामान, हर जगह वैसी ही मानसिकता. धीरे -धीरे ही सही बाज़ार सब जगह सबके ऊपर हावी होता जा रहा है. बाज़ार के इस विज्ञापन का तर्क मुझे समझ में आया कि अगर लड़कियां अपनी मादक मुस्कान से कुछ सामान बेच सकती हैं तो अपने आप को क्यों नहीं.
कहीं भी मुझे नारीवाद के पैरोकारों कि आवाज़ इस मुद्दे पे नहीं सुनायी दी. अमेरिका लिबरल नारीवाद कि प्रसिद्ध जगह है.यहाँ के विश्विद्यालयों में इसके ऊपर मैंने कही भी बहस नहीं देखा. हो सकता है कि यह यहाँ पे कोई सवाल ही नहीं हो.

Wednesday, May 5, 2010

नहीं कहलाना पाकिस्तानी...

नहीं कहलाना पाकिस्तानी...
पाकिस्तान के लोग जो अमेरिका मे रहते हैं, उनमें से अधिकतर अपना परिचय एक भारतीय के रूप मे देना पसंद करते हैं. कोई अमेरिकन यदि उनसे पूछता है कि" आर यू इंडियन" तो उनका जबाब हाँ में होता है. यह बात मुझे पहली बार समझ में नही आई. लेकिन जो भारतीय यहाँ कई सालों से हैं, उन्होने जब यही बात कही तो मुझे सच में बहुत ही ताज्जुब हुआ. मेरी समझ में नहीं आया कि कोई कैसे अपनी राष्ट्रीयता छिपाने में गर्व महसूस कर सकता है. भारत और पाकिस्तान में कभी भी दोस्ती का संबंध नही रहा है, इसलिए मुझे समझने में परेशानी हुई कि कोई कैसे अपने को शत्रु राष्ट्र का नागरिक बताने में हिचकता नही है.जिस पाकिस्तान के निर्माण के लिए क़ायदे आज़म ने कोई कोर कसर नही छोड़ी, जिसके लिए लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ, वहीं के लोग केवल ६ दशकों के बाद ही अपने को वहाँ का नागरिक कहलाने में अच्छा अनुभव नही करते हैं. जिन लोंगों ने आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ा है, उन्हें यह बात हजम होने वक़्त लगेगा. ख़िलाफत मूवमेंट के बाद और डाइरेक्ट एक्सन दे और उसके बाद बटवारे के समय के दंगों की बात पढ़ने पर आज भी मॅन सिहर उठता है. जिस नयी राष्ट्रीयता की खोज के लिए यह सब हो रहा था, उसी राष्ट्र में पैदा हुए लोग विदेश में जाकर अपनी राष्ट्रीयता बताने में अच्छा महसूस नही करते है. वे अपने को भारतीय बताने में ज़्यादा अच्छा समझते हैं. राजनीतिक दर्शन का विद्यार्थी होने की वजह से पाकिस्तान की अराजकता, इस्लामिक कट्टरपंथ, ग़रीबी, तालिबान, अल क़ायदा जैसे ढेरों प्रश्न समझ में आते हैं. अपनी वास्तविक पहचान छिपाना कोई नही चाहता है, पर बदले हुए हालातों मे ऐसा हो रहा है तो नये राष्ट्रों के लिए होने वाले संघर्षों का अंजाम अच्छी तरह से देखा जा सकता है.
अटलांटा में पाकिस्तान के बहुत से लोंगों के पास बिजनेस है, भारतीयों के पास भी बिजनेस है. वे एक दूसरे से मिलते हैं, साथ मे खाना भी खाते है. मैने किसी पाकिस्तानी नागरिक के साथ भारत में खाना नहीं खाया था.क्योंकि कभी ऐसा मौका ही नही मिला था. यहाँ लाहोर रेस्तूरेंट में एक पाकिस्तानी परिवार ने दावत दी थि.लजिज खाना के साथ हुई बातचीत में "राष्ट्रीयता" का दर्द साफ दिखायी दे रहा था.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा

Sunday, May 2, 2010

एक मई के सवाल

आज एक मई है .दुनिया के सभी मजदूरों के एक होने के स्वप्न का यह नारा क्रेमलिन के चौक पर भी नही सुनायी दिया. एकाएक ऐसा क्यों हो गया की मजदूरों की आवाज़ इस दुनियां में दम तोड़ती जा रही है. जबकि हकीक़त है की आज भी इस दुनियां में सबसे अधिक आबादी कामगारों की ही है. जनतंत्र के अपने मायनों के बीच अगर सबसे अधिक आबादी की आवाज़ गुम हो गयी है तो इसमे किसका दोष है. खुद कामगारों का या उनको इशारों पे नचाने वाले उन लोंगो का, जिनके लिए वे तिनके के बराबर भी हैसियत नही रखते. प्रश्न ये है की दुनियां की सबसे बड़ी आबादी आज भी ये क्यों नही समझ पाती है कि उनकी अपनी नासमझी कि वजह क्या है. मार्क्स के इतने समय बीतने के बाद भी यदि मजदूरों कि बात करने वाले संगठन अपनी हैसियत राजनीति में नहीं बना पाते है तो उनके संगठन के मूल मंत्र में जरुर कोई खामी है. मूल सूत्र के अभाव में कोई रास्ता तय नही हो सकता. वह सूत्र मजदूरों के अपने बीच से आएगा, प्रयोगशाला में बैठकर इसकी चिंता नही कि जा सकती है. जैसे प्यास लगने पे पानी के पास हम खुद ही जाते है, वैसे ही कामगारों को कोई दूसरा मंत्र नही देगा, उन्हें अपने लिए, अपने आपसे उस मंत्र को ढूढना होगा. पर ये भी सही है कि अमेरिका में बैठ कर मजदूरों और गरीबों कि चिंता नही कि जा सकती है, ये चिंता भी उतनी ही भोथरी है, जितना ये सोचना कि विश्व बैंक सच मुच में दुनिया से गरीबी को हटाना चाहता है.आधार वाक्य ही जब सही नही रहेगा तो निष्कर्ष कहा से सही होगा. इस लिए ये कहना लाज़मी है कि हमे प्यास बुझाने के लिए अपना कुआं खोदना ही पड़ेगा. विश्व बैंक कि सोच को उधार लेकर जो तरक्की का रास्ता भारत में बताया जा रहा है और उसे इंद्र से मिला हुआ वरदान माना जा रहा है, उसकी पूरी स्थिति को छिपाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी जा रही है. भारत को अपने पैरों पे खड़ा होने के लिए, गरीबी को हटाने के लिए उसके अपने मर्म को समझना होगा. उधार के सिद्धांतो से कोई देश अमीर नही बनता.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा, अमेरिका