नहीं कहलाना पाकिस्तानी...
पाकिस्तान के लोग जो अमेरिका मे रहते हैं, उनमें से अधिकतर अपना परिचय एक भारतीय के रूप मे देना पसंद करते हैं. कोई अमेरिकन यदि उनसे पूछता है कि" आर यू इंडियन" तो उनका जबाब हाँ में होता है. यह बात मुझे पहली बार समझ में नही आई. लेकिन जो भारतीय यहाँ कई सालों से हैं, उन्होने जब यही बात कही तो मुझे सच में बहुत ही ताज्जुब हुआ. मेरी समझ में नहीं आया कि कोई कैसे अपनी राष्ट्रीयता छिपाने में गर्व महसूस कर सकता है. भारत और पाकिस्तान में कभी भी दोस्ती का संबंध नही रहा है, इसलिए मुझे समझने में परेशानी हुई कि कोई कैसे अपने को शत्रु राष्ट्र का नागरिक बताने में हिचकता नही है.जिस पाकिस्तान के निर्माण के लिए क़ायदे आज़म ने कोई कोर कसर नही छोड़ी, जिसके लिए लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ, वहीं के लोग केवल ६ दशकों के बाद ही अपने को वहाँ का नागरिक कहलाने में अच्छा अनुभव नही करते हैं. जिन लोंगों ने आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ा है, उन्हें यह बात हजम होने वक़्त लगेगा. ख़िलाफत मूवमेंट के बाद और डाइरेक्ट एक्सन दे और उसके बाद बटवारे के समय के दंगों की बात पढ़ने पर आज भी मॅन सिहर उठता है. जिस नयी राष्ट्रीयता की खोज के लिए यह सब हो रहा था, उसी राष्ट्र में पैदा हुए लोग विदेश में जाकर अपनी राष्ट्रीयता बताने में अच्छा महसूस नही करते है. वे अपने को भारतीय बताने में ज़्यादा अच्छा समझते हैं. राजनीतिक दर्शन का विद्यार्थी होने की वजह से पाकिस्तान की अराजकता, इस्लामिक कट्टरपंथ, ग़रीबी, तालिबान, अल क़ायदा जैसे ढेरों प्रश्न समझ में आते हैं. अपनी वास्तविक पहचान छिपाना कोई नही चाहता है, पर बदले हुए हालातों मे ऐसा हो रहा है तो नये राष्ट्रों के लिए होने वाले संघर्षों का अंजाम अच्छी तरह से देखा जा सकता है.
अटलांटा में पाकिस्तान के बहुत से लोंगों के पास बिजनेस है, भारतीयों के पास भी बिजनेस है. वे एक दूसरे से मिलते हैं, साथ मे खाना भी खाते है. मैने किसी पाकिस्तानी नागरिक के साथ भारत में खाना नहीं खाया था.क्योंकि कभी ऐसा मौका ही नही मिला था. यहाँ लाहोर रेस्तूरेंट में एक पाकिस्तानी परिवार ने दावत दी थि.लजिज खाना के साथ हुई बातचीत में "राष्ट्रीयता" का दर्द साफ दिखायी दे रहा था.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा
The common person’s feelings and observations, though often unspoken, carry immense weight in shaping history. Everyday experiences—love, struggle, joy—form the heartbeat of human existence. Philosophy isn’t about complex jargon; it’s about distilling these simple truths into ideas that resonate. Great philosophers like Socrates or Buddha were ordinary in their curiosity, seeing the world through a lens of wonder and clarity. In that sense, we’re all philosophers.
Wednesday, May 5, 2010
Sunday, May 2, 2010
एक मई के सवाल
आज एक मई है .दुनिया के सभी मजदूरों के एक होने के स्वप्न का यह नारा क्रेमलिन के चौक पर भी नही सुनायी दिया. एकाएक ऐसा क्यों हो गया की मजदूरों की आवाज़ इस दुनियां में दम तोड़ती जा रही है. जबकि हकीक़त है की आज भी इस दुनियां में सबसे अधिक आबादी कामगारों की ही है. जनतंत्र के अपने मायनों के बीच अगर सबसे अधिक आबादी की आवाज़ गुम हो गयी है तो इसमे किसका दोष है. खुद कामगारों का या उनको इशारों पे नचाने वाले उन लोंगो का, जिनके लिए वे तिनके के बराबर भी हैसियत नही रखते. प्रश्न ये है की दुनियां की सबसे बड़ी आबादी आज भी ये क्यों नही समझ पाती है कि उनकी अपनी नासमझी कि वजह क्या है. मार्क्स के इतने समय बीतने के बाद भी यदि मजदूरों कि बात करने वाले संगठन अपनी हैसियत राजनीति में नहीं बना पाते है तो उनके संगठन के मूल मंत्र में जरुर कोई खामी है. मूल सूत्र के अभाव में कोई रास्ता तय नही हो सकता. वह सूत्र मजदूरों के अपने बीच से आएगा, प्रयोगशाला में बैठकर इसकी चिंता नही कि जा सकती है. जैसे प्यास लगने पे पानी के पास हम खुद ही जाते है, वैसे ही कामगारों को कोई दूसरा मंत्र नही देगा, उन्हें अपने लिए, अपने आपसे उस मंत्र को ढूढना होगा. पर ये भी सही है कि अमेरिका में बैठ कर मजदूरों और गरीबों कि चिंता नही कि जा सकती है, ये चिंता भी उतनी ही भोथरी है, जितना ये सोचना कि विश्व बैंक सच मुच में दुनिया से गरीबी को हटाना चाहता है.आधार वाक्य ही जब सही नही रहेगा तो निष्कर्ष कहा से सही होगा. इस लिए ये कहना लाज़मी है कि हमे प्यास बुझाने के लिए अपना कुआं खोदना ही पड़ेगा. विश्व बैंक कि सोच को उधार लेकर जो तरक्की का रास्ता भारत में बताया जा रहा है और उसे इंद्र से मिला हुआ वरदान माना जा रहा है, उसकी पूरी स्थिति को छिपाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी जा रही है. भारत को अपने पैरों पे खड़ा होने के लिए, गरीबी को हटाने के लिए उसके अपने मर्म को समझना होगा. उधार के सिद्धांतो से कोई देश अमीर नही बनता.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा, अमेरिका
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा, अमेरिका
Subscribe to:
Posts (Atom)