13 November, 2011
जितने लोगो को अधिकतर देखा, उनमे से बहुत कम ऐसे है जो अपनी संवेदनाओ के साथ दूसरे की भावनाओ को साथ लेकर देखते है..कभी अपनापन कभी परायापन क़ा बोध होने वाले सहज एहसासों के साथ बहुत से लोग दुहरी जिंदगी को जीने के लिए बाध्य हो जाते है. मूल्यों के साथ कदमताल करते हुए बहुत ही कम लोगो देखा जा सकता है.सबसे पहले निजी वैयक्तिक अधिकारों पर चोट कि जाती है.उसके बाद बहुत सारा काम अपने आप ही हो जाता है.
October, 2011
मुझे समझ मे नही आता की कोई किसी को कैसे समझा सकता है की यह काम मत करो. अनुशासन तो अपने आप से आता है. कभी कभी बहुत सी चीजे सीखी जाती है. पर किसी के मूल प्रवृत्ति को कैसे बदला जा सकता है. लोग अपनी आदतो को जल्दी नही छोड़ना चाह्ते है.इसके लिए किसी को बाध्य भी नही किया जा सकता है. सवाल यह है की मात्र कह देने भर से भ्रष्टाचार खतम हो जाएगा क्या? इसको पूरा करने के लिए जो उर्जा चाहिए वह कहा से आएगी. एक इन्जिनियर को कैसे समझाया जा सकता है की वह सही तरीके एक मानक के तहत उस सड़क का निर्माण कराए जिसके लिए टेन्डर हुआ है. अपने सपने को पुरा करने के लिए वह लोगो से मिलिभगत करके चोरी जरुर करेगा. इस वजह से घटिया सड़क का निर्माण होगा.
Tuesday, October 4, 2011, morning
रोज सवाल करती है ज़िन्दगी
सुबह होने के बाद..
यह एक ऐसा सवाल करती है
जिसका उत्तर मै कभी भी दे नहीं पाता.
क्या करते है लोग,..
September, 2011
आज बी एच यू की सड़क पर मार्निंग वाक करने के लिए रोज की अपेक्षा कुछ ज्यादा लोग दिखाई दिए . .
२९-०७-२०११
जिसके मन में कुछ होता है, वही कुछ लिखता है. कवितायेँ और कुछ ऐसे विचार जो सम सामयिक होते है, वे अपने आप प्रकट हो जाते है. पर लगता है मेरे जेहन मे कुछ भी विचार नही है। और मुझे गाँधी और ग्लोबलायिजेसन पर लिखना है, और इसको मै कई दिनों से टाल रहा हू. आयोजक से मैंने अतिरिक्त समय भी मागा और उन्होंने बहुत ही सहजता से मेरा आग्रह स्वीकार कर लिया. फिर भी मै आश्वश्त होकर इस लिखने के काम को कई दिनों से नज़र अंदाज़ कर रहा हू. आखिर मै क्यों ऐसा काम कर रहा हू जिस से मुझे बाद में दुःख होगा. समय के हिसाब से मै क्यों नहीं सतर्क हू.आलसीपन को क्यों पकडे हुए हू.पढने के समय में पढने क़ा काम तो होना ही चाहिए. लगता है मै अपने काम को अच्छी तरह से नहीं कर रहा हू. दुःख भी नहीं है की मै अपने ही दिए हुए काम को नहीं कर रहा हू.
February 5, 2011
अपने देश मे मिश्र या अरब की तरह लोग क्यू नही सड्कों पर उतर रहे है ??
The common person’s feelings and observations, though often unspoken, carry immense weight in shaping history. Everyday experiences—love, struggle, joy—form the heartbeat of human existence. Philosophy isn’t about complex jargon; it’s about distilling these simple truths into ideas that resonate. Great philosophers like Socrates or Buddha were ordinary in their curiosity, seeing the world through a lens of wonder and clarity. In that sense, we’re all philosophers.
Saturday, November 12, 2011
Monday, February 28, 2011
corruption
कल शाम रामबहादुर राय की स्पीच सुनी. उन्होने भ्रष्टाचार पर बहुत बाते बताई. १९९१मे चन्द्रशेखर और मोहन धारिया के एक फ़ोन का हवाला देते हुए उस समय के प्रधानमन्त्री के आर्थिक सलाहकार मनमोहन सिंह को उन्होने जब बेईमान कहा तो स्रोताओ ने बहुत देर तक ताली बजाई . आज राय साहब पूरे लय मे थे. उनको बहुत दिनो के बाद बनारस मे सुनना बहुत अच्छा लगा. खामियो पर बोलते हुए कहा कि ये संविधान ठीक नही है, इसे बदल देना चाहिए. इसमे गान्धी के हिन्द स्वराज की मूल आत्मा कही नही है.उन्होने अम्बेडकर को कोड करते हुए कहाँ कि अम्बेडकर ने कहा था कि जब इसे जलाना होगा, उसमे सबसे पहले मेरा नाम होगा. जिस संविधान मे गाव और परिवार कि बात नही है, वह देश का विकास कभी नही कर सकता. उन्होने भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतर आने और नए "संविधान सभा" के गठन के वास्ते छात्रो और शिक्षको का अह्वाहन करते हुए "जय - हिन्द" कह्कर अपनी बात समाप्त की.
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