Saturday, December 8, 2012

नेता जी का दर्द

 नेता जी का दर्द

मुझसे  एक नेता  जी  ने  कहा कि  जो  लोग नेताओ पर  आरोप  लगा रहे  है , उन्हें नही मालूम कि  नेता  बनना इतना  आसान  नही है. नेता बनने के लिए बहुत पापड बेलने पड्ते है। अगर नेता बनना इतना आसान होता तो, सभी लोग नेता नहीं बन जाते? यह बात मुझे सही लगी। हालांकि नेता लोगों की बात मै बहुत ध्यान से नहीं सुनता हू। पर पहली बार नेता जी का दर्द और दर्द का मर्म मुझे समझ में आया. मैने सोचा कि मुझे इनकी बातों मे दिलचस्पी क्यो हो रही है.आगे नेता जी ने कहा कि नेताओ को भी दुख होता है. उनको भी पीडा होती है। मंत्री बनने में कइ साल लग जाते है.पैसा कमाने के कुछ दिन ही मुअस्सर होते है.इस पर भी सबकी निगाह नेताओ पर ही लगी रहती है.नेता जी की भावना उमड्ती जा रही थी, और मै चुपचाप उनकों सुन रहा था.
कार्पोरेट मीडिया के विरोधाभास और विरोधाभासों की मीडिया
 कार्पोरेट मीडिया का पेशेवर तरीका हाल के दिनों में बदलता हुआ नजर आया। जो लोग मीडिया को लोकतन्त्र का चौथा खम्भा मानकर यह आस लगाये हुये थे कि यह देश में लोकतान्त्रिक पारदर्शिता को मजबूत करेगा, उन्हें बहुत ही निराशा हुयीं। जब सरकार और अन्य संस्थाओ का भ्रष्टाचार मीडिया की सुर्खियां बनने लगी तो,तो यह आस जगी कि  अभी भी मीडिया स्वतंत्र और बिकाऊ नहीं है.लेकिन गहरे तरीके से पड्ताल करने पर कुछ दूसरी ही तस्वीर सामने आती है. अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाली पत्रकारिता कैसे उन विषयों पर मुखर होकर विश्लेषण कर सकती है,जो उन लोगों से सरोकार रखती है, जिनका पैसा उसकी कार्पोरेट मीडिया में लगा है? यह पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफ़ है.सच्ची खबरें प्रस्तुत करना और सही पडताल करना मात्र पत्रकारिता का उद्देश्य नही रह गया है। बल्कि अपनी संस्था के लिये लामबन्दी करना और विग्यापन लाना भी पत्रकार के पेशे में शुमार हो गया है.   इसी तरह स्टिंग आपरेशन  भी अब भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक सशक्त माध्यम न होकर भ्रष्टाचार करने  का सशक्त माध्यम बनता जा रहा है.