Thursday, August 13, 2015

 विरासत-पहचान
इस देश की विरासत को जानने का असली अर्थ क्या है? कैसे इस बात को समझा जा सकता है। कई तरह से समझने पर इसके अलग अलग पक्षों को देखा जा सकता है। अगर इसके निषेधात्मक पक्ष को देखें तो अलग बात निकलती है और विश्लेषण करें तो कई नयी बातें पता चलती हैं. कैसे, किस दृष्टि से देखें तो सही जानकारी मिले। सब लोगों ने अपने समझ के तरीके से एन सब चीजों को व्याख्यायित करने की कोशिश की है। आज के जमाने में, जब विग्यान का इतना बोलबाला है, तब कितना निराशाजनक हो जाता है, इस विचार को समर्थन करना कि अपना पुराना युग बहुत सही था। हर चीज को, जो पुरानी हो, महाकाव्यात्मक रूप नहीं दिय़ा जा सकता है। हम इतिहास की हर घटना का महिमामंडन नहीं कर सकते है ना ही हमे इस तरह की विचारधारा को तवज्जो देने की जरुरत है।  एक भारतीय होने से हम अपनी विरासत के प्रति भावुक जरूर हो सकते हैं, लेकिन उस भावुकता का कोई बौद्धिक आधार भी होना चाहिए। 
आज हम एक ऎसे समाज में रहते है, जहां अपनी संस्कृति की पहचान को बनाए रखने के लिए कई तरह के यत्न करने पड़ते हैं। इस यत्न में हम कुछ पुराने पड़ चुके कर्मकांडों को भी अपनाने की कोशिश करते हैं, धर्म के सन्दर्भ में यदि हम अपनी अस्मिता और पहचान को बनाए रखना चाहते हैं , तो कर्मकांडों को हम कहीं न कहीं जरूर अपनाते है। धर्म का कट्टरवाद इसी तरह जन्म लेता है। इस्लामी कट्टरवाद इसी तरह से अपने को लोगों से जोड़ता है। इस प्रयोग मे कभी कभी वह सफ़ल भी होता है. 
प्रश्न उठता है कि क्या धर्म के पुराने पड़ चुके रिचुअल्स आज के समाज में भी प्रासंगिक हैं? अगर साइंस हमारी सोच को बदलने में कामयाब नहीं हो पा रहा है तो किस तरह से पुरातनपंथी और पीछ्ड़ी सोच से बाहर आ सकते हैं? धर्म के बाह्य आडंबर और अपनी अस्मिता को बचाए रखने में ऎसा कुछ नहीं है, जिसे कामन समझा जा सके, लेकिन इस जगह पर वे अपस में गलबहिय़ा करते हुए दिखाई देते हैं। चालाक किस्म के लोग इसी आधार पर मासूम लोगो को कर्मकांड और धर्म के नाम पर बेवकूफ़ बनाते हैं.
पहली बात तो यह है कि हमारी विरासत और हमारी पहचान किसी तरह से कर्मकांडों के अधीन नहीं है, इसलिए कभी भी इसका हौवा नहीं बनाया जाना चाहिए। जो लोग ऎसा करते है वे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए करते हैं। धर्म और ईश्वर ने कोई ऎसा फ़रमान नही सुनाया है। मजहबी जज्बात और और किसी खास तरह के प्रदर्शन से हमारी पहचान नहीं बनती है। अगर हमको अपनी पहचान के बारे में कोई काम करना है, तो सबसे पहले, अपनी सोच को विश्लेषणात्मक रुप देना होगा। हम पुरातन सोच से नयी दुनिया की चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते हैं। अगर दुनिया में अपनी पहचान बनानी है तो साइंस को अपनाना ही पड़ेगा। अगर भारत को विश्व गुरू बनना है, तो उसे अपने नागरिकों को यह सिखाना पड़ेगा कि विग्यान सीखो,

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